हम आँसुओं की दरिया बहाते

Poem By Dr. Navin Kumar Upadhyay

अगर जिगर में न होती मुहब्बत
क्यों हम आँसुओं की दरिया बहाते।
हँसते खुद भी, न तुमको रुलाते,
खुशी की दरिया में तुमको नहाते।
गमे-इश्क में न खुद को भुलाते,
न ही तड़पकर, तुम्हे ंभी तड़पाते ।
न ही तेरा नाम लेकर जीवन पल गुजारते,
न ही तेरे दिल को अपनी चीख सुनाते।
न ही तुम्हारे बिना सताता भी पल मुझे,
न ही तनहाई के क्षण मार डालते।
न ही जग लगता तुम्हारे बिना मुझे सुनसान,
न.ही अँकवार भरने को दिन-रात मरते।
न ही सहारा पाने को रहता दिल में हसरत,
न ही तुम्हारे दामन में मरने को रोते।
न ही तुम्हें पाकर, होता हमको मर्सरत,
न ही तुम्हारें कदमों में मिलने को रोते।
न ही तुम्हारे नाम सुन मिलता सुकूँ हमको,
न ही तुम्हारी चर्चा, हम सुनने को तरसते।
न ही तुकम्हें देखने को, जी मेरा तरसता,
न ही तेरी तस्वीर देख, मेरी आँखें बरसते।
न ही अपनी मजार पर हम आने को कहते,
न ही अपनी आँचल मजार पर डालने को कहते।
'नवीन' जिन्दगी में बचा न अब कुछ भी,
हम हरदम हरपल साथ रहने को तरसते।

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