सिया, झूलन पधारहु

Poem By Dr. Navin Kumar Upadhyay

कहत राम रघुबर, सिया, झूलन पधारहु।
सावन हरित मास वर्ष बाद आयो, हरित हरित होई तुम        हरषावहु।
घन घटा काली कजरारी आई, उमड़ि घुमड़ि गर्जत, तुम    न डरावहु।
चातक ताकत स्वाति इक बूँद  कहुँ, तुजम चकोरनि बनि सुख सरसावहु।
वाद्द बाजत गाढ़े, निरखैं तव नैन उदारे, कृपा करुणा कोर    उघरावहु ।
सखी ससमाजन आईं प्रमुदित धाईं, झूलन पधारि आनँद    उमगावहु।
सरयू तीरे हिंडोरा राजत, सुषमा भ्राजत, 'नवीन'कृपा आनँद बरसावहु।
     

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