हम पगला गये।

Poem By Dr. Navin Kumar Upadhyay

नींद नहीं आ रही मुझे,
निशा मुझे तड़पा रही।
कब लग जाओगे गले,
यह सोच अब रुला रही।।
बहुत दिन.बीत चले गये,
तुमने तो खबर ली नहीं ।
सपने में रोज आकर मिलते,
कभी नहीं तुम.भुला. पाये ।।
सोचा न था कभी जीवन में,
तुम बस जाओगे मुझसे दूर।
तनहा हो जायेंगे इस कदर,
'नवीन'सोच हम पगला गये।।

Comments about हम पगला गये।

प्रिय से बिछोह और उसकी पीड़ा का बहुत सुन्दर वर्णन है इस कविता में. धन्यवाद.


5,0 out of 5
1 total ratings

Other poems of UPADHYAY

सिया, झूलन पधारहु

कहत राम रघुबर, सिया, झूलन पधारहु।
सावन हरित मास वर्ष बाद आयो, हरित हरित होई तुम        हरषावहु।
घन घटा काली कजरारी आई, उमड़ि घुमड़ि गर्जत, तुम    न डरावहु।
चातक ताकत स्वाति इक बूँद  कहुँ, तुजम चकोरनि बनि सुख सरसावहु।

हे भोले, महादेव, हे बाबा!

हे भोले, महादेव, हे बाबा!
जब तू घुमत बाड़ डगरिया में,
तब हम कहाँ जाईं मँदिरिया में।
पीअर पीअर पहिने तू सबमें जना ला,

हे रे प्यारे, हम घूमे बहुत परदेश,

हे रे प्यारे, हम घूमे बहुत परदेश,
अब ले चल अपने देश।
काली नगरिया काली माटी,
कोऊ कर नहिं है धवल, देव! वेश।

Pablo Neruda

If You Forget Me