सीने पर ग़म रख लेता हूँ

सीने पर ग़म रख लेता हूँ,
आँखें भी नम रख लेता हूँ।

मेरा भी मन रह जाता है,
जब तेरा मन रख लेता हूँ।

इन आँखों में सारे मंज़र,
सारे मौसम रख लेता हूँ।

जब बाँटू अपनों में हिस्सा,
मैं अपना कम रख लेता हूँ।

अच्छा और बुरा ना आँकूं,
जो दे हमदम रख लेता हूँ।

by Shiv Parashar

Comments (2)

मेरा भी मन रह जाता है, जब तेरा मन रख लेता हूँ।.... //.... अद्वितीय अभिव्यक्ति. धन्यवाद, मित्र.
A wonderful piece of poetry indeed. An outlook reflecting humaneness in life and towards fellow beings will bring happiness and bliss to the heart. Thanks for the ghazal and Congrats on being a part of PH.