वो कश्ती पड़ी हुई है आज बेजान

वो कश्ती पड़ी हुई है आज बेजान

जो पानियो पर बहा करती थी

उसे बहा ले जाने के लिए

आज न नदी की धार है

ना पानियो की फुहार है

आज वो कश्ती खुद नदी की तली के

रेत में समा जाने वाली है

नदी कश्ती को पुकार रही है

कश्ती माझी को पुकार रही है

माझी अपने मुक्कदर को तलाश रहा है

हर छूटी हुई सांस को अंतस में जगा रहा है

कश्ती टूटकर टुकड़ो में बिखरी जा रही है

नदी के बहाव को अब भी अपने तन पर पा रही है

उस सूखे रेत से ही अपने चप्पुओं को चला रही है

वो कश्ती उस नदी की तली में जा समा रही है

जो उसकी लहरों पर खिलखिलाकर गोते खाती थी

****

by Kezia Kezia

Comments (0)

There is no comment submitted by members.