कहाँ सुलग पायेगी

अपने सानिध्य को अवरुद्ध कर

बहते शेष को सुघड़ कर

बारीक सुई सी माटी को खोकर

मन उद्घृत अवशेषों को धोकर

पा गया एक पारदर्शी पारावार

समक्ष वृन्दाओं का एकांक जीवन आधार

पारदर्शिता की विस्मित गरिमा का सत्कार

उद्देश्यों में मचा विकराल हाहाकार

मन चारण के उद्घोष में सोकर

आवागमन के अहम् में संतृप्त होकर

कहाँ सुलग पायेगी ये चिंगारी

जो आज तक पड़ी कहीं सो रही है

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by Kezia Kezia

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