हे रे प्यारे, हम घूमे बहुत परदेश,

Poem By Dr. Navin Kumar Upadhyay

हे रे प्यारे, हम घूमे बहुत परदेश,
अब ले चल अपने देश।
काली नगरिया काली माटी,
कोऊ कर नहिं है धवल, देव! वेश।
तन जर्जर भये, मन भँवर फसे,
अब दीखत न नयन पथ परिवेश।
चारों ओर अँधियारो दीखत,
सोहात न कुटिल काम कृष्ण केश।
जहँ-जहँ फँस्यो मन, पायों कपट धन,
दीखत न ममता कहीं लेश।
चलो यार, अब विलँब न कीजिए,
'नवीन'छोड़ो जग, हे परमेश!

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हम पगला गये।

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निशा मुझे तड़पा रही।
कब लग जाओगे गले,
यह सोच अब रुला रही।।

सिया, झूलन पधारहु

कहत राम रघुबर, सिया, झूलन पधारहु।
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घन घटा काली कजरारी आई, उमड़ि घुमड़ि गर्जत, तुम    न डरावहु।
चातक ताकत स्वाति इक बूँद  कहुँ, तुजम चकोरनि बनि सुख सरसावहु।

हे भोले, महादेव, हे बाबा!

हे भोले, महादेव, हे बाबा!
जब तू घुमत बाड़ डगरिया में,
तब हम कहाँ जाईं मँदिरिया में।
पीअर पीअर पहिने तू सबमें जना ला,

Rudyard Kipling

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