हम अपनी आँख जब मूँद लेते,

Poem By Dr. Navin Kumar Upadhyay

हम अपनी आँख जब मूँद लेते,
पता नहीं, कैसे आ जाते हो
।कितना डर लगता दुनिया से तुमको,
आहट पा भाग जाते हो!

Comments about हम अपनी आँख जब मूँद लेते,

There is no comment submitted by members.


Other poems of UPADHYAY

हम पगला गये।

नींद नहीं आ रही मुझे,
निशा मुझे तड़पा रही।
कब लग जाओगे गले,
यह सोच अब रुला रही।।

सिया, झूलन पधारहु

कहत राम रघुबर, सिया, झूलन पधारहु।
सावन हरित मास वर्ष बाद आयो, हरित हरित होई तुम        हरषावहु।
घन घटा काली कजरारी आई, उमड़ि घुमड़ि गर्जत, तुम    न डरावहु।
चातक ताकत स्वाति इक बूँद  कहुँ, तुजम चकोरनि बनि सुख सरसावहु।

हे भोले, महादेव, हे बाबा!

हे भोले, महादेव, हे बाबा!
जब तू घुमत बाड़ डगरिया में,
तब हम कहाँ जाईं मँदिरिया में।
पीअर पीअर पहिने तू सबमें जना ला,

हे रे प्यारे, हम घूमे बहुत परदेश,

हे रे प्यारे, हम घूमे बहुत परदेश,
अब ले चल अपने देश।
काली नगरिया काली माटी,
कोऊ कर नहिं है धवल, देव! वेश।

Langston Hughes

Dreams