पूछ लिया साँता को एक दिन,

पूछ लिया साँता को एक दिन,
आ जाते मृग रुप धर कर,
भाग जाते छलांग लगाकर,
यहाँ जगत में रहती अशांति,
क्यों न घुसकर बसते हर हृदय में हर पल,
तब ही तो रहेगी हर मन में शाँति,
फिर न कहना पड़ेगा,
ऊँ शाँति शाँति शाँति!

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

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