योगी मुनि न धीर धरत,

योगी मुनि न धीर धरत,
जन जिय-हिय बेहाल करत,
सुर मुनि योगी ऋषि भी न बचत,
सुख कतहूँ अब कोऊ नहीं लहत।

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

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