रँभादिक सुरनारि गान करत,

रँभादिक सुरनारि गान करत,
चहुँ ओर उमँग भरि नृत्य भरत,
आनँद चहुँ ओर अँबुधि बनत,
सब कर मन मन्मथ आजु ग्रसत।

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

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