जड़-चेतन करत हाहाकार,

जड़-चेतन करत हाहाकार,
कामदेव लियो निज बदन पसार,
कोऊ नहीं बच्यो सँसार,
आजु भर ल़ो, हे प्रिय! अँकवार।

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

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