आनंद सूक्त

आनंद सूक्त(हिन्दी भावानुवाद)
परम परात्पर परब्रह्म परमेश्वर हिय उठ गई एक कामना।
किया स्मरण मन महँ, कैसे बन सके अपनी अवराधना।।
रचना जनित सृष्टि बन गई, बन गया स्वयं जापक रुप।
जपता अपने आप स्वयं मन्त्र, स्वयं ही इष्टदेव स्वरूप।।
किया जप अपने आपको, उसने जपे निज मँत्र दश बार।
पूण^ हुई अर्पण दश आहुति, दशहुत नाम से होता पुकार।।
जाना जाता वह दश होता, दश आहुति उसे लगी प्रिय।
परोक्षतः वह स्वयं होता, देवता होते ही हैं परोक्ष प्रिय।।
पुनः किया सप्त बार, अपने ही नाम का अनुपम जप।
ध्यान किया निज स्वरूप, परम प्रिय पावन पुनीत तप।।
जितने बार जपे मन्त्र उनने, उतनी बार की अर्पित आहुति।
नाम-मन्त्र जप से सहज होती, इष्टदेव परमा प्रीति।।
सप्तहोता सँज्ञा विभूषित किया, तब उसका ही नाम।
परोक्षतः वह सप्तहोता बन गया, देवताओं को प्रिय परोक्ष नाम।।
स्वयं उसने कर लिया षड् बार जपे, स्वयं अपने
मन्त्र।
षडहोता नाम बनकर आया, आहुति स्वरूप निज तँत्र।।
उसी नाम से पुकारा जाता, तब उसका एक और नाम।
यद्यपि अगम अनादिनिधिनान्तस्वरुप उसका ही नाम।।
करता रहता जप परब्रह्म, तब अनवरत निज स्मरण।
पँच बार पुकार कर किया उसने, किया निज स्वरूप वरण।।
पांच बार की आहुति अर्पित, पँचहोता नाम से पुकारते।
दिव्य देदीप्यमान अनुपम नाम से हम, अपना जीवन सँवारते।।
पँचहोता नाम से पुकारा जाता, परम परात्पर परब्रह्म प्रिय।
देवता परोक्ष नाम से जाने जाते, उन्हें है परोक्ष स्वरूप प्रिय।।
सहज अनवरत स्मरण तत्पर परब्रह्म, पुकारा उसने चार बार।
बारँबार मन्त्र जप करता, करता आहुति उतनी बार।।
चार बार पुकारा नाम बोल कर, अर्पित की आहुति चार-बार।
चर्तुहोता नाम से पुकारते परब्रह्म को, हम सब करते पुकार।।
देवता को परोक्ष नाम प्रिय, हम उसे इसी तरह जानते।
सदा ही सँग रहते, लेकिन हम कभी भी न लख पाते।।
नाम पुकार-पुकार कर अनवरत, बन गया तद्स्वरुप वह।
अपने निज स्वरूप सँग चिन्तन से, बन गया था तद्स्वरुप रह।।
तब उसके मुख से निकली वाणी, तुम तो हो हमारे अँश।
सबसे निकटतम आत्मस्वरूप, तुम हमारे ही वँश-अवतँश।।
कहा जाता चर्तुहोता उसे, श्रवण किया तुमने मेरा नाम।
मेरे आत्मज, मेरे प्रियवर, तुम बन गये मेरे अँश विद्ममान।।
तुम स्वरुपवत् मेरे ही हो, मुझमें तुममें कोई अँतर नहीं ।
केवल सेवक-सेव्य भाव हित, हमने किया अँतर कहीं।।
सेवा-सहिष्णुता-त्याग-सँतोष-प्रेम श्रद्धा क्षमा भाव सव^स्व,
जीवन आनंद का मूल धर्म, मँगलमय मोद का परम रहस्य।
जो जान लेता, यह परम तत्व, पहचान लेता परब्रह्म तत्व को।
"नवीन"न कहीं ढूँढता, इधर-उधर फिरता, हर जगह देखता परम तत्व को।।
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Nkupadhy
6Jan2018

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

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