नई-नई आशा उमँग

नई-नई आशा उमँग भर कर
हम दुनिया में आये थे।
नयी जहाँ- जहाँ देखकर,
फूले नहीं समाये थे।।
लेकिन जब मैंने देखा,
जब मुझ नवजात देख,
किसी को दुख हुआ,
तब मेरे भी आँखों में
आँसू भर आये थे।
जब तक माता अँक मिला,
हुआ न कोई कहीं असर,
लेकिन
जब वह भी दूध छूट गया,
बच गया न कोई कोर-कसर;
सब बच्चे दूध पीते थे,
मैं उनको देख तरसता था,
मगर मेरे लिए घर में
कुछ भी हिस्सा न बचता था;
माँ झूठ-झूठ कह
फुसलाती थी,
और
मैं भी सच समझता था,
आखिर माँ-माँ ही है,
कैसे अविश्वास कर सकता था!
परबाबा थे घर में
उनकी गोद बस मेरा सपना,
उनके सिवा था
न कोई अपना,
बहुत प्यार करते थे,
उनको मुझे खिलाने की आदत थी,
बात-की-बात में,
खेल-ही-खेल में,
पराशक्ति को दिखाने की,
हिम्मत-ताकत थी;
अक्षरारंभ कराया उनने,
मन्दिर पास अँक अक्षर लिखाते थे,
आज जो हर्रफ लिखता हूँ,
उनके ही दिए-बताये हैं,
जो कुछ भी लिखता-पढ़ता हूँ,
उनके ही बीजमंत्र बताए हैं,
आज प्रणाम करने का है दिन,
सव^प्रथम प्रणाम उनको करता हूँ,
उनके ही दिये लोक में रहता हूँ,
अविरल अश्रुधारा चरणों में वर्षण करता हूँ।
माता बचपन में कहाती सुनाती थी,
बड़े प्रेम से सुनता था,
वह सब सहज कँठस्थ हुआ,
जो कोई भी न रट सकता था;
कुछ रट गया था श्लोक दुल^भ,
सभाओं में लोग सुनते थे,
लोगों की तालियां सुन-सुन,
मेरी बाँछें खिल उठते थे,
रहती थी उम्मीद यही,
आज मुझे मिलेगा सम्मान,
और
बढ़ जायेगा स्वाभिमान।
धीरे-धीरे उम्र बढ़ती चली,
शिक्षा हवा पुरजोर बढ़ती मिली,
अँक अच्छे मिलते गये,
शिक्षा पूरी हुई,
आशा-निराशा का दौर साथ सँग मिला,
कभी ऊपर, कभी नीचे;
नौकरी एक मिली कालेज में अध्यापन की,
मन न लगा,
एक ही अध्याय, हर वर्ष!
आई मन निराशा,
विश्वविद्यालय आया,
लिए मन में आशा,
मन में आ जाती निराशा,
फिर घिर आई आशा,
फिर आये सरकारी नौकरी में,
यहाँ भी एकरसता,
तब
मन फिर लौट चला,
परबाबा श्रीचरण,
रहते थे जो हमेशा अध्ययनरत,
स्वाध्याय हुआ आरँभ,
वाणी की कृपा हुई,
रचना स्फुरण आरँभ हुआ,
शरीर शय्याग्रस्त,
रचना अनवरत,
श्रीगीतगोविन्द भावानुवाद,
विश्वास आज भी नहीं होता,
क्रम रुका नहीं,
अनवरत,
गीता, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, हिन्दी पद्यानुवाद,
सीता, पाव^ती विवाह गीत,
रचना हो रहे,
और
शरीर विकलांग!
वाह!
क्या तेरी भी लीला,
हे गुरुदेव!
आपके पढ़ाए हर बीजमंत्र के तरुवर
आपको छाया प्रदान करने के लिए आतुर
बहुत खुशी होगी आपको देखकर,
यह पौधा मैंने ही लगाया था!
पुनः पुनः प्रणाम!
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by Dr. Navin Kumar Upadhyay

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