आशा नव किरण देख,

आशा नव किरण देख,
हम मँदिर जब जाते हैं।
घृत-स्नेह, प्रेम बाती जला,
श्रद्धा सुमन बस चढ़ाते हैं।।
पत्थर की मूर्ति पिघल जाती,
वह भी न रह पाती पत्थर है।
चिल्ला-चिल्ला कर कहती,
क्या करता तू बस कायर है!
आये हो, जो दुनिया मे अभी,
क्यों न देखते मुझे हर मानव में।
हर कण-कण में बसता मैं ही,
सुभग देवता या कुटिल दानव में।।
क्यों वक्त बेवजह बबा^द करते,
जिन्दगी बस आज भर जीनी है।
दया सहानुभूति भाव सेवा 'नवीन'
छोटे से लम्हे में मुहब्बत करनी है।।
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Nkupadhy
5.Jan2018

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

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