श्रीरुद्रप्रश्न लघुन्यास

श्रीरुद्रप्रश्न लघुन्यास(हिन्दी पद्यानुवाद)
मन जगत जँजाल ओर करत,
हृदय परमात्मा सँसार।
हे हरि! तव चरणन बिनवन करौं,
समाईये सुखमय बहार।।
मम वाचा पावक बसैं
वाणी रहें सदा सहृदय।
सदा सुधारसरुप रहौं,
रहौं परम पद निभ^य।।
पवन बसैं प्राण समीर महँ,
करै मोर हृदय बास ।
सदा परम परात्पर ब्रह्मसँग रहौं,
काहू की नहिं आश।।
नयन बसैं देव भास्कर,
लखैं सव^दा हियकमल।
अमृत तत्व गृह सुभग बसौं,
दृष्टि लखैं सुविमल ।।
सुधाकर महँ बसैं,
सोई विराजैं हिय-प्राण।
ब्रह्म तत्व स्थिर रहौं,
बसौं अमृत तत्व जहान।।
श्रवण विराजैं दसों दिशि,
सुनैं सदा सुभग हृदय पटल।
परम परात्परत्व तत्व सुनौं,
दिव्य सुखद सदैव निर्मल ।।
जीव रस जल महँ बसत,
ताहु बसैं हृदय महान।
परम परात्पर परब्रह्म तत्व,
सदा बसैं मेरे हिय प्राण।।
बदन धरातल पर रहै,
अँग-अवयव करैं हृदय सँचार।
परम सच्चिदानंद परब्रह्म,
बनैं सदा हृदय परिवार।।
लोम पादप भेषज बसैं,
करैं वास हिय अन्त: करण।
परम प्रभु परमात्मा तत्व केवल,
सदैव करते रहें मोरे वरण।।
मम बल देवाधिपति बसैं
हिय पटल करैं निवास।
परम सच्चिदानन्द विग्रह तजि,
और काहू की नहीं आश।।
मम शीर्ष पर्जन्य निवास करैं
हृदय से करैं निमंत्रण।
परमात्मा परम स्वरूप प्रभु,
करैं मम जन नियंत्रण।।
अहम् भाव रुद्र समाश्रिताः
सोऊ लै हिय कर समाश्रय।
परम परमात्मा अनन्त अखण्ड,
. रखै मोहि सदा निभ^य।।
आत्मा परमात्मा अवस्थित,
सोऊ बसैं हृदय परमात्मा पद।
परम अखण्ड अनन्त अगोचर,
सदा बसैं मोर परम पद।।
मम आत्मा मम प्राण मम राग,
बसैं सदा मेरे हिय पटल।
नित्य नव सब बिधि परम अनन्त,
वास करैं सदा हिय कमल।।
परम परमात्मा प्रभु कृपा तें,
मिलत दुल^भ मानव शरीर।
मानव राग-रोष -ईष्या^ तजै,
तबै कहि जात सो परम वीर।।
सोई परम धीर, परम वीर,
जो करुणा-प्रेम-सँतोष फैलावै।
अँग-अँग, रग-रग, कण-कण,
"नवीन"परम परात्परत्व लखावै।।
@Copyright
All rights reserved
Nkupadhy
3 Jan2018

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

Comments (0)

There is no comment submitted by members.