हम इन्सान पैदा हुए जब,

Poem By Dr. Navin Kumar Upadhyay

हम इन्सान पैदा हुए जब,
पहले बोले, आए कहाँ हैं?
हम कहाँ के थे रहने वाले,
और चले आए हम कहाँ हैं?
दुनिया ने वही पाठ पढ़ाया,
जो चलता आया इस जहां है।
वही सिक्का चलाना सीखा,
जो चलता आया इस जहाँ है।।
आँखों पर पट्टी पड़ गई मेरी,
दीखता न राह कहीं, सही कहाँ है?
हम निभाते दुनिया के तौर-तरीक़े,
असलियत में अब रहते कहाँ हैं?
हकीकत सब जानते भले देखते,
लेकिन मजबूरी में जीना यहाँ है।
जिन्दगी में सीधे रहना न मुमकिन,
चुपचाप बस रहना, भला यहाँ है।।
दबाते हैं इन्सान को सच कहने से,
ईसा सम शूली पर चढ़ना यहाँ है।
मरने बाद भलेअगरबत्ती जलायें,
फिर तो अमर ही कहाना, यहाँ है।।
दुनिया की बस इतनी ही ताकत,
कि मच्छर पर तोप चलाते यहाँ हैं।
मनाते जश्न सरेआम पूरी दुनिया,
लहूलुहान धरती बनती बस यहाँ है।।
क्या करेगा भला बिधाता बेचारा,
उसने ही तो बनाया यह जहाँ है।
किसी को नफरत न होनी चाहिए,
मुहब्बत की इमारत बनाते कहाँ है?
एक ही माँ-बाप के हम दोनों बेटे,
जमीं-टुकड़े लिए जान लेते यहाँ हैं।
भाई ही भाई की जान लेने वाला,
तब फिक्र कौन करेगा, इस जहाँ है।।
यदि जान जाती दुनिया यह भली,
हम अमर बनकर ही, इस जहां हैं।
सबकी जान ले लेता बस तुरँत ही,
और कहता, सामने अल्लाह यहाँ है।।
जब थोड़े दिनों के लिए ही हम आये,
और न रहना हमेशा के लिए यहाँ है।
फिर इगो कैसे कब कहाँ से आ गया,
जब लौट कर फिर न देखना यहाँ है ।।
जब सब ही उसी एक ख़ुदा के बन्दे,
उसका हिस्सा रहता तेरे बदन जहां है।
फिर क्यों आपस में भिड़ते-लड़ते रहते,
जब सारी खुदाई एक ऊपर की जहां है।।
आओ हम मँगलमय नूतन साल मनायें,
गले लगाने ही बच आये बस इस जहां हैं।
छोड़ेंआपस-नफरत, करें मुहब्बत इबादत,
फिर लौट कर मिलना भी 'नवीन'एक जहां है।।
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Nkupadhy
30, Dec,2017

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