न कुछ बदला,

न कुछ बदला,
न बदलेगा,
न ही बदलता कभी,
धरती वही,
आसमान वही,
बिधाता वही,
त्राता वही,
सँहारकर्ता वही,
प्रकृति वही,
जगत वही,
काम-क्रोध-लोभ-मद-मोह वही,
राग-रोष-ईषणा वही,
हमने एकरस से जुदा होने के ढूँढे बाजार,
कोई -न-कोई
मन जाये त्यौहार,
और
गिनती गिनते रहते बस
खुशी - पव^ मनाने में
कितने दिन
बच गये,
त्योहार हो जाता खत्म,
फिर
ज्यों -के-त्यों बन जाते,
अगले पव^-दिन
गिनते रह जाते
और
फिर और फिक्र मे ं
जुट जाते....।

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

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