ऋग्वेद प्रथम मँडल भावानुवाद:

ऋग्वेद प्रथम मँडल भावानुवाद:
हे अग्निदेव!
हे लोक-परलोक परमाचार्य,
स्वयंभू,
परोक्ष-प्रत्यक्ष स्वरुप!
निरँतर अभय-वरद रुप,
हम याचक बन आये,
आपके द्वार,
करें शरणागति स्वीकार;
दें अपनी प्राप्ति,
आपसे श्रेष्ठ कोई नहीं,
याचक को दें
कृपा-दान,
पुनः पुनः प्रणाम! 1।(1.1)
हे देव पावक!
पुरातन काल ऋषि प्रपूजित,
वर्तमान भक्त जन वृन्द वन्दित,
आपको हम करते वन्दन-पूजन,
कर लें सब देवताओं का आवाहन।(1.2)
हे अनल देव!
आप सुनते सब जन की प्रार्थना,
करते पूण^ सकल मनोकामना,
करते जन को वैभव जो प्रदान,
नित्य नवल रुप में विवध^मान,
वैभव-यश-सुख -सन्तति जो करें प्रदान,
हों सकल कर्म परम देदीप्यमान।(1.3)
हे वह्नि देव!
आपकी प्रबल रक्षण समर्थ शक्ति,
करते ग्रहण निवि^घ्न सकल आहुति,
करते आप, हे देव! जो हवि ग्रहण,
सकल देव पायें, परम तृप्ति-ग्रहण।(1.4)
हे कृशानु देव!
आप स्वयं हवि प्रदान कर्ता,
ज्ञान -कर्म-भक्ति-सेवा
शक्ति भाव प्रेरणकर्ता,
स्वयं सत्यस्वरूप परम विलक्षण,
हे देव! करें आप सकल देवों को आमँत्रण।(1.5)
हे देव दहन!
आप करते जो निज जन समृद्धि,
वैभव सन्तति यश शक्ति की वृद्धि,
होता जो जन का सव^विधि कल्याण,
करना चाहता वह सदा आपका दर्शन महान,
सव^दा सुखी निहाल रहता उसका जिय,
वह अनवरत दर्शन करता, आप श्रीभवदीय।
(1.6)
हे दिव्य देदीप्यमान सुजान!
हम आपके चरण-सेवक, हे महान!
करते विनम्र प्रार्थना, हम सहृदय भाव,
गुणगान करना मेरा, सहज स्वभाव,
हम चाहते देव, दें आप चरण-रति,
सदा रहे मुझे, आपकी पदकमल सँगति।(1.7)
हम हैं महामतिमन्द, मूढ़मति,
आप यज्ञदेव की अनन्य गति,
सत्य-चित्-आनंद स्वरुपवरमूर्ति,
यज्ञकर्म सम्पादन सुखप्रद प्रतिमूर्ति,
हम करते महादेव अग्नि, आपको नमन,
कृपा करें, हे देवता! हम आपकी शरण।
(1.8)
जैसे सुत को मिल जाते पिता सहजस्वरुप
वैसे ही आप मिलें देव! आप करुणाभूप,
आप करें हे भगवान! मेरे आत्मयज्ञ को पूण^,
बन जाये हमारा जीवन, परम आनंदपूण^।
(1.9)
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Nkupadhy

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

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