मानवता का धर्म

मानवता का धर्म

हर चीज का एक वक्त है
आदमी और औरत मुक्त है
कोन कैसा सम्बन्ध रखना चाहता है!
वो निजी मामला है।

संबंध एक अटूटडोर है
पर ज्यादा शोर होता है
कई लोग उसमे विघ्न डाल रहे है
ऐसा करकेरिश्ते कीतोहिन कर रहे है।

उसमे दरार तब आती है
जब शर्ते रखी जाती है
उसको रिश्ता नहीं कहते है
बस एक कामचलाऊ सम्बन्ध होता है।

रिस्ते का सन्मान करना चाहिए
बाप बेटे, लड़की और माँ में एक अलग तरह की चाह है
आप का किसो के साथ जुड़ जाना एक महज संयोग है
या यूँ कहे की, एक योग है।

रिश्तो को बनाए रखे
उसका निरंतर स्वाद चखे
उसमे मधुरता है
अपनी एक मर्यादाहै।

मज़बूरी का यहाँ कोई स्थान नहीं
जो नहीं मानता उसका कोई विधान नहीं
हम सब एक ही रिश्ते से बंधे है
मानवता का धर्म सब से ऊपर है।

by Hasmukh Amathalal

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