मुंतज़िर ही रहा ये आलम

मुन्तज़िर ही रहा ये आलम
विसाले यार के लिये
शबे तवील फिर आयी
किसी इंतज़ार के लिये
कहकशाँ-ओ-माहताब देखा किये
नज़रें प्यासी ही रहीं
तेरे दीदार के लिये।

by Ahatisham Alam

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