आज फिर दर्द छलका: -मोहित मुक्त

आज फिर दर्द छलका।
आँख फिर आज रोयी।
प्रिये, दिल ने फिर से-
स्मृतियाँ संजोई।

शिशिर रात में वह-
प्रणय के मधुर क्षण।
चांदनी की चादर पर -
हम और तुहिन-कण।
नर्म लबों पर-
पीयूष सा वो पानी।
हौले हवा में -
वो घुलती जवानी।
पल पास हैं सब-
तुम हीं हो खोयी।
आज फिर दर्द छलका।
आँख फिर आज रोयी।


शलभ बन जला मैं,
शिखा प्यार की थी।
बात इच्छाओं के,
बस सत्कार की थी।
जुदा मोड़ पर,
आज दोनों खड़े हैं।
गम के कड़े शूल,
दिल में गड़े हैं।
आँसू से तुमने-
भी आँखे भिगोई।
आज फिर दर्द छलका।
आँख फिर आज रोयी।

by Mohit mishra

Comments (3)

A good start with a nice poem, Mohit. You may like to read my poem, Love And Lust. Thank you.
bahut badhiyaa...10.. dil ko sujun dene vali kavitaa
Unparallel dear Mohit. Although it is your first poem in the sight, Frankly speaking a poem waved by feelings and imagery deemed very proper.I am overwhelmed.A big 10+++++.Plz go through my poems and comment on my page.