हम करते आदित्य देव को प्रणाम, सप्रेम नमन।

Poem By Dr. Navin Kumar Upadhyay

हम करते आदित्य देव को प्रणाम, सप्रेम नमन।
आप ही समस्त कर्ता-भर्ता, करते अहर्निश वँदन
ब्रह्मा, विष्णु, शिव आप ही जानता नहीं कौन!
वाणी भी न कह सकती महिमा, रहतीं सदा मौन
ऋक्, साम, यर्जु, अथवर्वेद आप, शास्त्र सब तुम
वेदों के गानमय छन्द आप, सँगीत आचार्य तुम
पृथ्वी जल वायु अग्नि आकाश, सबमें विराजते
समस्त दस दिशाओं में, आप ही देवता भ्राजते।।

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हम पगला गये।

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निशा मुझे तड़पा रही।
कब लग जाओगे गले,
यह सोच अब रुला रही।।

सिया, झूलन पधारहु

कहत राम रघुबर, सिया, झूलन पधारहु।
सावन हरित मास वर्ष बाद आयो, हरित हरित होई तुम        हरषावहु।
घन घटा काली कजरारी आई, उमड़ि घुमड़ि गर्जत, तुम    न डरावहु।
चातक ताकत स्वाति इक बूँद  कहुँ, तुजम चकोरनि बनि सुख सरसावहु।

हे भोले, महादेव, हे बाबा!

हे भोले, महादेव, हे बाबा!
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हे रे प्यारे, हम घूमे बहुत परदेश,

हे रे प्यारे, हम घूमे बहुत परदेश,
अब ले चल अपने देश।
काली नगरिया काली माटी,
कोऊ कर नहिं है धवल, देव! वेश।

Pablo Neruda

If You Forget Me