हम उनकी बात करते हैं,

Poem By Dr. Navin Kumar Upadhyay

हम उनकी बात करते हैं,
जो अपने में कभी न रहते हैं;
सदा ही दूसरे में खोये,
जो औरों की ही कहते हैं।

उनकी अलग ही दुनिया है,
इस जहां से न मतलब है;
न इस जगत में रहना उनको,
न कभी भी यहाँ बसते हैं।

न तन-बदन का होश उनको,
न बसन की उनको चिन्ता है;
मन से भी जुदा उनकी दुनिया,
अपनी तनहाई में कुछ बोलते हैं।

दीख जाता बदन भले कभी,
लेकिन उनके मन का वास अलग,
दिखावे के लिए रहते केवल,
कभी भी न 'नवीन'रमते हैं।

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