हम आजतक न समझा पाये अपने को,

Poem By Dr. Navin Kumar Upadhyay

हम आजतक न समझा पाये अपने को,
आँखें बार बार उधर ही क्यों चली जाती;
जिनने न समझा मेरे दर्द को कभी अबतक,
धड़कनें बार बार उन्हें क्यों केवल पुकारतीं!

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हम पगला गये।

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यह सोच अब रुला रही।।

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कहत राम रघुबर, सिया, झूलन पधारहु।
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हे भोले, महादेव, हे बाबा!

हे भोले, महादेव, हे बाबा!
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हे रे प्यारे, हम घूमे बहुत परदेश,

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