रँग से तुम अलग, इसीलिए हम भी सादे हैं;

Poem By Dr. Navin Kumar Upadhyay

रँग से तुम अलग, इसीलिए हम भी सादे हैं;
कोरे कागज से रहने के इरादे हैं;
बचाना मुझे, ग़र रँगने की कोई कोशिश करे,
हमने भी किये सादे रहने के वादे हैं।

Comments about रँग से तुम अलग, इसीलिए हम भी सादे हैं;

Saving life with love with great dignity is definitely very nice. We also have the promises to fulfill through love. An excellent poem is very nicely penned.10


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हम पगला गये।

नींद नहीं आ रही मुझे,
निशा मुझे तड़पा रही।
कब लग जाओगे गले,
यह सोच अब रुला रही।।

सिया, झूलन पधारहु

कहत राम रघुबर, सिया, झूलन पधारहु।
सावन हरित मास वर्ष बाद आयो, हरित हरित होई तुम        हरषावहु।
घन घटा काली कजरारी आई, उमड़ि घुमड़ि गर्जत, तुम    न डरावहु।
चातक ताकत स्वाति इक बूँद  कहुँ, तुजम चकोरनि बनि सुख सरसावहु।

हे भोले, महादेव, हे बाबा!

हे भोले, महादेव, हे बाबा!
जब तू घुमत बाड़ डगरिया में,
तब हम कहाँ जाईं मँदिरिया में।
पीअर पीअर पहिने तू सबमें जना ला,

हे रे प्यारे, हम घूमे बहुत परदेश,

हे रे प्यारे, हम घूमे बहुत परदेश,
अब ले चल अपने देश।
काली नगरिया काली माटी,
कोऊ कर नहिं है धवल, देव! वेश।

Pablo Neruda

If You Forget Me