वर्षा गीत (3) बादल बरसे न आग ही थमीं (Hindi)

बादल बरसे न आग ही थमी.
भट्टी में भुनती रही ज़मी.

एक युग बीता वरदान सा,
एक युग बेईमान हो गया.

नंदनवन अगर था पहला युग,
यह झुलसा रहा श्मशान सा.

हर दृष्य निर्जल हत् देख कर,
आँखों में तैर गयी नमीं.

ॠतुओं के इस प्रदेश में,
सावन भादों में सूखा क्यों है?

मनुजों के मन मसल रहा,
बादल तानाशाह हुआ क्यों है?

कारण इसके तो हम हैं नहीं,
फिर भी बंधक बनेंगे हमीं.

कुदरत के आरोप - पत्र पर
गिन गिन के बदले लेगा.

शायद उसके बाद जा कर,
मौसम का रुख बदलेगा.

जले होंगे कहीं पर दिए,
हमारे तो गाँव में गमीं.


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(Faridabad, India)
(November 14,2014)

by Rajnish Manga

Comments (3)

This is a beautiful poem on nature and drought having touching expression with nice collocation in Hindi. As we have polluted the environment Nature is taking revenge. कुदरत के आरोप - पत्र पर /गिन गिन के बदले लेगा. Nice imaginary. Thanks for sharing.10
bahut hi sundaAR abhivyakti............ manav ko ab prakritee se chher chhar band karni hogi......nahin to parinam bahut bura hoga aapne behatar rachna ki hai sir....jab-jab manav ka patan hua sahitya ne hi margdarshan kiya thanks for sharing with us........lovely poem with great message..........10+++
A poem written in a language that is a sangam of Ganga and Jamna, with hidden charms of Sarawati.