APS (27.7.1953 / Muzaffarpur)

A-003. क्यूँ करते रहते हो इशारे

क्यूँ करते रहते हो इशारे 5.12.15—6.21 AM

क्यूँ करते रहते हो इशारे
जब पास आना नहीं है
क्यूँ देखे चले जाते हो
जब साथ निभाना नहीं है

क्यूँ पास बुला लेते हो
जब मुस्कराना नहीं है
क्यूँ करीब आते हो
जब गले लगाना नहीं है

सीने में मेरे क्या ढूँढ़ते हो
गर कुछ जताना नहीं है
क्यूँ दूर चले जाते हो
गर हाँथ छुड़ाना नहीं है

क्यूँ अश्क बहाते हो
जब कुछ बताना नहीं है
क्यूँ रौशन करते हो शमा
जब पास बिठाना नहीं है

रुको और सोचो तो जरा
तुमको किसने रोका है भला
बाहर कोई भी नहीं है
तेरा अपना ही है कोई गिला

गिले को पकड़कर क्या मिला
जो हुआ वो हुआ था तब हुआ
तुम्हारा अपना इक विचार है
उसका भी अपना इख़्तियार है

विचारों के मेल का अपना संसार है
बाकी सब कहानियाँ हैं और भार है

दूसरे को सुन कर देखो तो जरा
हर कोई अपने आप कैसे है भरा
सुनने में ही जिंदगी का आसार है
यही मिलना है यही चमत्कार है

Poet: Amrit Pal Singh Gogia 'pali'

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Comments (2)

While you do not want to walk together side by side why do you give symbols of expression without any purpose.? Very amazing expression here silently speaks about love on its own way...10
विचारों के मेल का अपना संसार है बाकी सब कहानियाँ हैं और भार है.... Wah...kya kavita likhi hai aapne...Beautiful flow...Really touched my heart...full of depth...Nice picture as well...