अनेको जीवन और चन्द्र के सारे गमन - Aneko Jivan Aur Chandra Ke Saare Gaman

आरहा था करते सारी लपटों को स्थिर स्थिर अविचल
एक सपना दिखाता, मेरी बात मानवता
बैठ पाया था कहीं
जैसे मिली थी हलकी नीली कमल शांत, बस दो घूंट,
कोई कहे की खुशकिस्मती तुम्हारी,
सुन पाए तुम्हारे जीवित जो मृत गूंजते आकांत
जैसे मान सके हों के अपने भी कभी नहीं थे राम नाम से ही बस बाण

बैठ पाया था कहीं,
अद्भुत है वर्णन, उस रात का
दीवारों पे परछाइयाँ थी, रेखित थी,
शाखों की, शाखों से उनपे सजे फूलों की
बचा एक सेतु था मेरे आँखों तक चन्द्रालोक से, रेखीत सा
हवाओं में बुना था जैसे बस चंद ही धागों सा सुगंध

मगन मगन हूँ जो,
इस भुवन का मैं मुकुंद
सरसर सरसर भाव है,
इस वायु का मैं उन्मत्त-प्रमत्त

मगन मगन हूँ जो,
इस भुवन का मैं मुकुंद
सरसर सरसर भाव है,
इस वायु का मैं उन्मत्त-प्रमत्त

अस्तावस्त पर मेरा संगीत जब,
सुनाई दी एकही आवाज,
फट सी गयी थी जैसे दुनिया,
ऐसे जो दस्तक दे गयी एक अपरिचित एक अनजान,
सैलाब सी आ थमकी मेरे सफलता के ओर जाते द्वार,

छुट सा गया वोह मुकुंद,
भस्म हुआ वोह भाव

अब कुछ नहीं था,
कुछ भी नहीं था,
और मैं भी
ना ढूंड रहा हूँ वोह भाव,
और ना ही वोह
हलकी नीली कमल शांत


किसे था पता के ख़ुशी को भी देख सकूँगा ऐसे,
जैसे जी चूका हो अनेको जीवन और चन्द्र के सारे गमन.

by Yashovardhan Kulkarni

Comments (0)

There is no comment submitted by members.