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फिर कोई होगा - Fir Koi Hoga

जीवन मरण,
कुल अब तक जो भी मैं, हूँ जहां
बस एक जमीं, बस एक समां
मुकाबले अंतर्मन, मेरे और तेरे
लगता हूँ जैसे
बस एक थान भरा

वो वहां, मुझे लगता है
वो वहां-
तुम दीखते हो
तुम शायद वहीँ होते हो
या मेरेही जैसे
वही तुम होते हो

मुझे बस एक करना है
वो बात जो जेहन में मेरे
उसे कहकर
फिर तुम्हारा इन्तेजार करना है

मैं मेरे थान पर खड़ा
जितना चाहूँ चींख लूँ
किसीभी और थान,
किसीभी, और मन को नहीं पाता हूँ
उन कई कई घेरों के बींच से कभी नहीं निकल पाता हूँ

हवाएं मेरे आवेगों की, बहती है
मेरे थान की मिट्टी,
जैसे अपने बेटे को सजाए
उस हवा के मुखपर अपने साज को चढ़ाती है

मेरे आवेग,
मेरे निष्कर्षों की गति
मेरे थान पर
सब कुछ है

वही लेकिन-
मेरे आवेग
किसी और मन के लिए
किसी और थान पर
जैसे-
कुछ भी नहीं

तो-
निष्कर्ष निष्फल
तो-
होनी होगी कोशिश
मिलाकर अपनी अपनी मिट्टी, जो बुनियादी

तुरंत यूँ उठता हूँ
मिट्टी मेरे थान की
अपने हाथों में भर चल देता हूँ
हाँ वहाँ तुम हो,
तुम्हारे थान की राह पकड़ता हूँ

हाथ भर दिए मिट्टी से इस
सोचता हूँ कैसा होगा-
कैसा होगा जब दोनों तरफ की मिटटी मिल जाएगी
हमारी यादें कैसी होंगी
हमारे दिन कैसे होंगे
एक बात होगी उसके क्या क्या जवाब होंगे

के कैसा होगा किसी और के मन में घूमना
नई नई बाग़ देखना
उस जगह की मिटटी और हवा का नाता महसूस करना
के कैसा होगा-





रास्ते में लेकिन एक, फिर एक और
गड्ढे हैं
उन गड्ढों में मेरी फूटी योग्यता का प्रतिबिंब दीखता है
मैं उनमें हाथ में भरी मेरी मिटटी झोंक देता हूँ
जिन खूबसूरत खयालों को लेकर निकला हूँ
उनको उस प्रतिबिंब की नजर से में
किस यत्न से बचाता हूँ

उस पर मेरे आवेग टेड़े
आवेग टेड़े,
जो अपना वचन कभी नहीं निभाते
वापस अपने संग संग, पर जरुर
एक वर्षा ले आते हैं
वो वर्षा मेरे थान गिरकर
मेरेही मिट्टी को कीचड़ कहने लगती है

अब तो जैसे हर जगह मेरे योग्यता का वो प्रतिबिंब दीखता है
मैं, लेकिन
जिन खूबसूरत खयालों को लेकर निकला हूँ
उनको उस प्रतिबिंब की नजर से बचाता हूँ
अब तो जैसे एक छोटी से छोटी राह बची है
मैं घसीट घसीट कर
उस तुम्हारे थान तक पहुँचने में लेकिन लगा रहता हूँ

अब कीचड़ लेकर आता हूँ
भरी वृष्टि
अपने आप को समेट कर
किसी तरह तुम्हारे थान आता हूँ

अपने थान की सीमा पर उस तरफ से तुम आते हो
मेरे हाथों को देख
उन्हें मलिन कह,
फिर तुरंत ही मुंह फेर लौट भी जाते हो

बस-
बस-
मैं वहीँ खड़ा हूँ
मैं वहीँ खड़ा हूँ
बस वही
उसी पल
मैं अलक्ष्य हो जाता हूँ

अब कोई जल्दी नहीं
कहीं पहुंचना जैसे मुमकिन ही नहीं

मैं मेरे हाथों को देखता हूँ
उस पर जमी मिट्टी ने कितना समय देखा
उस पर जमी मिट्टी ने तुम तक पहुँचने तक
मुझे कितनी बार गिरते उभरते देखा

उस वर्षा से में घुल जाता हूँ
बस वही
मैं उसी पल
मैं अलक्ष्य हो जाता हूँ

फिर कभी कहीं नहीं बढ़ पाता हूँ
फिर कभी उम्मीद की ड़ोर ले चढ़ नहीं पाता हूँ
अलक्ष्य जो हो जाता हूँ

मैं काल के निष्कर्ष की गति हूँ
कहीं जा नहीं पाता हूँ,
जैसे बिना पहचान की सर्वस्थित एक शुन्य हो जाता हूँ
अलक्ष्य जो हूँ

मैं अब भी वहीँ हूँ
मैं वहीँ 'होता हूँ
शायद कल
तुम मेरी अवस्था को पाओगे
शायद कल
मैं तुम्हारी अवस्था को पाउँगा

फिर कोई वैसेही दुसरे के सीमा पे खड़ा होगा
फिर कोई अलक्ष्य होगा

फिर इस जगत कोई होगा
जो अपने आगे कुछ भी ना देख पाता होगा

फिर कोई होगा
जो अकेला होगा

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