कहाँ मिलेगी सरहज साली, अौ ससुराली की गारी।

कहाँ मिलेगी सरहज साली, अौ ससुराली की गारी।
कहाँ पहनायेंगे ललन तुम्हें, रंगी बिरंगी मणिमय साड़ी।
आँचल से कौन मुँह पोछेगा, कहाँ मिलेगी सरहज चुचकारी।
निज कर कमलन, ग्रास कौन पवाएगी, सप्रेम तुमहिं पुचकारी।
सुनयना सम सासु कहाँ मिलेगी, करूणा विह्वल महतारी।।
मैथिल जन सम कोन वचन सुनायेंगे, गिन - गिन कर दै गारी।
कौशिक मुनि कहँ चरण कृपा तें, पइलौं सिया करकमल सुकुमारी।
सिया जू क संग प्रभु ‘नवीन' एक धन ले जाईअ, गठरी बाँध मैथिला गारी।।

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

Comments (1)

I like this poem I don't 100% agree with Joseph the other comment person because i believe poetry should be how you make it if you want to use sed for said I believe that should be fine.. I love your poems Krista