MC (9-2-89 / )

वाणी ग्रहण कर लेती उसे, जन नाम लेकर तृप्त हो जाते।

वाणी ग्रहण कर लेती उसे, जन नाम लेकर तृप्त हो जाते।
क्षुधा पिपासा परम शान्ति होती, परंतु इसे कभी उचित न समझते।।
घ्राणेन्द्रिय ने किया प्रयास तब, अन्न ग्रहण करने का।
यदि ऐसा हो जाता जगत मेंं, सुगँध साधन बनता तृप्त होने का।।

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

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