Gham Or Tanhai..(गमऔरतन्हाई)

Poem By pushpa p. parjiea

इंसान का अकेलापन इंसानको क्या क्या सोचनेके लिए मजबूर करते रहता है यहकुछ कल्पनासी की मैंनेऔरजो शब्द आते गए वोमैंने आपके सामने रखे हैंएक कविता के रूप में. कोई त्रुटी हुई होतोक्षमाप्रार्थीहूँ.


खुद को डुबो देते हैं नशे में ग़म में और तन्हाई में

फितरते सादगी कोबदल देते हैं

रुसवाइयों से रुसवा करके

शोरे दिल को समंदर की लहरों में लपेटे

डूबा देते हैं उसेउसी गहराईमें

बचने को एक मुसीबत से उतरे हैं दूसरी खाई में

ताकि ज़ख्म न दिखे ज़माने को जो नासूरबने चुभते हैं

नासूर बने हैं ज़ख्मअबजीने की और न ख्वाहिश है

निकलती आहेंजलतेजिगर से,

औरों के दर्द को देखा तो हम अपनी आहें भूल गए

पानी से शमा जलाते हैं न कि पानी से शमा बुझाते हैं

वक़्त की बहती नदी है किनारे ज़िंदगी और मौत हैं

ग़म कटे बदली हवाएं और खुशियाँ आ गईं

जब सांसेहुई पूरीऔर मौत ने बाहेंफैलाई.

Comments about Gham Or Tanhai..(गमऔरतन्हाई)

बचने को एक मुसीबत से उतरे हैं दूसरी खाई में वक़्त की बहती नदी है- किनारे ज़िंदगी और मौत हैं ग़म कटे बदली हवाएं और खुशियाँ आ गईं जब सांसे हुई पूरीऔर मौत ने बाहें फैलाई.... //.... कविता में जीवन के विविध रूप और उतार चढ़ाव नज़र आते हैं, परेशानियाँ हैं और उनसे पार पाने के उपाय भी हैं. लेकिन मालूम होता है कि अंततः मृत्यु ही मनुष्य के लिए सबसे बड़ी सुखदायक स्थिति है. इतने जटिल विषय को आपने बड़ी दक्षता से प्रस्तुत किया है. बहुत बहुत धन्यवाद बहन पुष्पा जी. Excellent poem.


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