षैलराज निज नगर सजायो।

षैलराज निज नगर सजायो। पथ बहारि सुरभित जल बरसायो।
विविध साधन किये पथ सुसज्जित। प्रति गृह द्वार किये कदली सुषोभित।।
गृह अजिर कदली कर खंभ लगामो। रेषम डोर रसालपत्र बंदनवार सजायो।।
मालती माल सुभग अजिर बिछायो। मंगल द्रव्य चहुँ दिषि षोभा बढ़ायो।।
सुभग रचना हित विष्वकर्मा बुलायो। मंडप रचना अति विस्तीर्ण करायो।।
बेदी सुभग मनोहर मंडल मधि राजत। बहु भोजन सुभग विस्तृतवर भ्राजत।।
मंडप षुभ गुण सम्पन्न विस्मयकारी बने। स्थावर जंगम वस्तु सब कृत्रिम बने।।
तदपि प्रतीति होत जीवंत बने सब। मंडप रचना अलौकिक लगे सब।।
अति अद्भुत वस्तु मंडप राजत, लागत जीवंत वसे प्राण।
विविध प्रकारन वस्तु सब राजत कृत्रिम लगें जीवन महान्।।
विविध प्रकार अद्भुत वस्तु सब राजता स्थावर जंगम, जंगल स्थावर जनु लागत।।
कोइ बूझत नहीं, कहाँ जल, कहाँ थल है। मन नहीं समुझ सकत, कहाँ निर्मल है।।
कहीं कृत्रिम सिंह वने, कहीं सारस अवली। कहीं बनावटी मोर-मोहत सुभग अली।।
कहीं कृत्रिम स्त्री, नर संग नृत्य करत हैं। कृत्रिम बने सब वास्तविक लगत हैं ।।
नर नारी तिन कहुँ हेरि मोहाहीं। कृत्रिम द्वारपाल जंगम सम सोहाहीं।।
मनुज देखि षर संधान करत वे। देखि देखि नर मोह भरत तेे।।
द्वारहिं ढाढे कृत्रिम लक्ष्मी, अद्भुत रचना दियो बनाय।
सर्वगुण सम्पन्न प्रतीतत, जनु क्षीरउदधि तें अबहिं धाय।।
मंडप विविध स्थल कृत्रिम हस्त ठाढ़े। जनु जीवन्त मदमत्त गज भे ठाढ़े।।
अष्व सहित असवारा हैं सोहत। गज सहित महावत हैं मोहत।।
रथियों बने बहु रथ सोहत। कृत्रिम अष्व हैं ता कहँ खींचत।
निरखि देखि सब अचरज मानहीं। देखत सोचत गुनत मन माहीं।।
कृत्रिम पैदल सिपाही भये ठाढ़े। विष्वकर्मा कृत्य अचरज में डारे।।
देखि देखि सब कहँ अचरज लागत। मन महँ गुनत समझ नहीं पावत।।
मंडप द्वार कृत्रिम नन्दी भे ठाढ़े। षुद्ध स्फटिक सम षुभ्र बने गाढ़े।।
षिव वाहन नन्दी जस आकृति। जनु वास्तविक बनी परमाकृति।।
कृत्रिम नन्दी उपर राजत, पुष्यक दिव्य रत्नभूपित।
वाम पारर्व दो कृत्रिम गण ठाढे़।
वषुह केषर समय रंग गाड़े ।।
तापर विविध साज सजे, पल्लव ष्वेत चामर सुसज्जित।।
चतुर्दत कृत्रिम बनाये जो। साठ वर्ष के दीखत हैं सब वो।।
परस्पर स्नेह करते वे प्रतीतत अति दिव्यकान्ति बने सब मोहत।।
ज्योतिस्वरूप दुई दिव्य हय बनाये। विष्वकर्मा कृत्य मनमावन सुहाए।।
चँवर अलंकृत दिव्य आभूषण संयुत सब देव लोकपाल दीखत कवचयुत।।
जनु साँचे दिकपाल हैं वे सब। हेरत जे जन, साँच मानत सब।।
भृग आदि समस्त तपाधवन ऋषि बने। अन्यान्य उपदेवता सिद्ध दीखते प्रेम सने।।
गरूड़ आदि पार्षदयुत श्रीहरि हैं ठाढ़े। साक्षात् श्री विष्णु सपरिवार पधारे।।
बिधि पुत्र वेद सिद्ध सयुंत हैं घिर। ब्रह्मा समान वैदिक सक्त पाठ करे।।
इन्द्र ऐरावत हस्त खड़े हैं दीखत। सपरिवार सदल वल जनु सुषमा भरता।।
सब कृत्रिम पूर्ण चन्द्र सम प्रकाषित। पुरी षोभा को करि सकै वर्णित।।
हिमाचल प्रेरित कियो, विष्वकर्मा कियो साज संभार।
बनायो देवसमाज कृत्रिम, बनायो सुर विग्रह संसार।।
दिव्य मंडप निर्माण कियों, अनेक आचरज बनायो महान्।
देखि सुर सब मन मोहत, विष्वकर्मा सम कौन बलवान।।
गिरिराज हिमवान दियो आयसु, विष्वकर्मा बनायो देव वास।
कृत्रिम लोक बनाय दियो, देवन हेतु सुखप्रद वास।।
लोकन रचना करि करि, बनायो सिंहासन रमणीय।
अति तेजस्वी परम विलक्षण, सुखदायक अति कमनीय।।
विधि हेतु सत्यलोक रचना बनायो। उत्तम दीप्तिपुंजयुत परम सुहायो।।
विष्णु भगवान हेतु कियो बैकुंठ रचना। परम उज्जवल विलक्षण संरचना।।
लोकपालों हित बने विषाल भवन। अति सुन्दर दिव्य सर्वगुण संपन्न।।
षिव कृपा तें पाईवर, षिवा सेवा हित कियो निर्माण।
जो हरि हर सेवा सदा निरत रहे, उन सब कौन महान्।।
षिव निवास हित सुभग गृह बनायो। षिवलोक सम दिव्य भवन बनायो।।
भवन सुभग श्रेष्ठ नाग त्रिषूल सुअंकित। बसहा, नन्दी, गंगा, माला चिहिन्न।।
सदन जटा जूट धारी तपस्वी चित्र काढ़े। माला जपत सब सुर सिद्ध ठाढ़े।।
सम्पूर्ण सदन षिवलिंग अंकित सोहत। देखि पेखि सुर सिद्ध सिर नमत।।
भवन उज्जवल, प्रभा पंुज उद्भासित। उत्तम अद्भुत चंदन सम

सुवासित।।
षंभु हुलास हेतु कियो अद्भुत रचना। महादेवहुँ नहि कहि सक निज रसना।।
सब साजि समाजि भयो अलौकिक लोक व्यवहार।
हिमवान मयना आनंदवर, षंभुवर लगि लगे पल पहाड़।।
उमा तें विवाह लगन निष्चय कियो, जब सप्तर्षि सुजान।
षंभु पहिं जाई सब बोले, कथा श्री गिरिजा महान्।।

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

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