कोई दौर जाग सकता है - Koi Daur Jaag Sakta Hai

शायद यहाँ कहीं कोई और हो सकता है
क्या जानूं के हाँ कोई दौर जाग सकता है

रक्त से भीगे हैं वक्त से रिश्ते मेरे
पर बेबसी कहती है की शायद कोई अंगूर मीठे हो सकते हैं

रास्तों पे हमें मंजिलों के हक़दार शायद उनके काफिलों में ले सकते हैं
शायद फिर हम किसी बुलावों को अलग अलग नींदों में सुन सकेंगे

'सूरज के मंडलों पे अन्दर गिरने से परेह कर यूँ चक्कर लगा रहा हूँ,
मेरा ऐतबार कर में बस फूलों की मालों को न बेताब हूँ'

के हाँ सांस तू आज ले सकता है
के ब्योपार तेरा शुरू रख सकता है
के हाँ कोई दौर फिर जाग सकता है

by Yashovardhan Kulkarni

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