[व्यंग्य] असमंजस से ऋणमुक्ति - [satire] Asamanjas Se Runmukti

असमंजस, धार प्रवाह इतने लांघ गयी
एक जो ख़त्म कर चुकी आकांक्षा अब दुसरे फिर तीसरे पर कूद कूद कर होकर हावी है आयी
किस ख़ाक से शिक्षा ले आयी है, है किसे मालुम,
आजकल तोह यूँकुदरत बन हर दिशा में है छाई-

अब की तोह अमरत्व की आखेट में व्यग्र है
थक ना जाऊं मैं, भूल बिसर इस शेखी को, विचार कर न लग जाऊं मैं
क्योंकि है नहीं इसके पास अपने हक़ की एक भी सांस
मुझसे ये-वोह, जो हो, सब कुछ खा जाने का इसरार करते रहती है

मैं अपने बचाव में चीजों की तह तक जाने की प्रेरणा का सबूत देता हूँ-
निर्विकार होने की चेष्टा करता हूँ
असमंजस, जो मुझसे डेढ़ कदम आगे और चार हाथ ऊपर दौड़ती, इस को-
ला ला कर, अस्तित्ववाद की प्रतिमा दिखाकर इर्ष्या से घायल करता हूँ

दूसरी तरफ उसकी हर बात भी मान लेता हूँ
हर सांस कुछ न कुछ गटकते रहता हूँ
अब की सोचता हूँ इसके काँधे पे सिर रख के सो जाऊँगा
कह दूंगा इतने दूर तक तो साथ आया
सब बेसोची जगहों पे तो तेरे काँधे पे सिर रख कर हो आया
अब उठ जाने पे क्या-
झूठ ही सही, कुछ बोल-बाल कर खिसक जाऊँगा

ऋणमुक्ति के सच को
अपने स्वभाव के सीमाओं के कारण फिर धिक्कार दूंगा-

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