[व्यंग्य] इमानदार सौदा - [satire] Imandar Sauda

आने वालों के लिए जानेके बाद
जानेवालों के लिए आनेपे वापस अगलीबार
ये तैयार हुआ इमानदार सौदा

इनके आंकडे देखो कैसे फसे
नौकरों में पाए भुक्कड़ धोबी, चंचल जौहरी और कपटी मोची
खुशकिस्मती मानो जो पूर्वज थे इनके हरफनमौला
लो आओ सुनो कह रहें हैं मालिक तैयार हुआ इमानदार सौदा

बात क्या,
इनकी बातों के साथ ये भी आते हैं
डर से ले के शेखी तक,
सभी कुछ कमर से बंधवाके ले चलते हैं
जो गया उसीके साथ तोह जीते हैं

सोचते हैं के कहीं कुछ रह ना जाए अधुरा
फिर जो करनी पड़ेगी अपने बारे में जद्दो-जेहत
इस स्व से व्याप्त समृद्ध गलियों में
के सुख ना जाए
खाली उमंग से भरा
भूत से जुड़ा खून उनका

ऐसे विद्यमान, अस्तित्ववान
मदहोश खुदिके
सोहबत बस अपने नौकरों के?

जो फिसल जाए एक लय से ये महाशय
प्रेम प्रकाश की बात करने के लिए कौन था कभी इनके पास?
झट ढूंढ लाए,
फट अपने मसले पे लगा आए
किसीका साथ जो ये थे चाहते, बेशुमार महाशय
नौकरों को अपने तुरंत ये बुला लाए

हाजिर है,
धोबी भुक्कड़, जौहरी मन चंचल
छोड़ आए सारे काम और उनके इलाज बेजार
दुसरे ही क्षण, पता नहीं क्यूँ, पर
धोबी रगड़ रगड़ था मालिक की कमीज,
जौहरी सिध्द करने में था लगा असली ही गहनों को फिर असली

मालिक कहता,
साबुन है अभी भी फसा, ऐसा उबड़-खाबड़,
ये कपडा अब पहनने में होगा भारी बड़ा
कभी कहता,
अबे ये कपडा धोए की क्या किए,
ये भी कपडा होगा पहनने में भारी बड़ा

जौहरी मन चंचल वहां अलग परेशान,
मालिक को कैसे बताए, सिद्ध करें
के गहने उनके अभी भी उतने ही खरे

मालिक कहता,
कौन बे झूठा, तूने जो बेचे थे गहने,
तो आज हमारी परख को गल्प हो कहते?

मोची कपटी अपना,
इसके बारे में भाई
छुप-छुप,
सब चुप, चुप,
बात ना आए जबान पे,
भांप ना जाए जिसको बना रख्खें हैं जवाबदेह,
भाई बोल रहें हैं
छुप-छुप,
सब चुप, चुप


किसी दिन गहरा इत्तेफाक हुआ
कमीज लगने लगी साफ़-साफ़ हलकी-हलकी
अचानक जैसे जौहरी की बातें लगती मालिक को साँच-सच्ची

आप, महाशय,
विद्यमान, अस्तित्ववान
फिर अपनी लय को पाते
भाई संभल गए कह के फिर मीठे मुस्कुराते?

खूब भाई,
इमानदार सौदे तक जाने की राह आप की खूब है
यहाँ तक की, इमानदार सौदे की नीव भी आप खुद हैं
पर ये ना था पता,
जो इमानदार सौदा हो कच्चा घड़ा, इसको पकाने में इत्तेफाक के कदरदान भी आप खूब थे

खूब भाई,
जो सुभीता के आप ऐसे पूजक
तो कैसे आलोचक की भूमिका में भी आप खुद हैं?

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