[व्यंग्य] मम्दू क्या करता है - [satire] Mamdu Kya Karta Hai

मम्दू क्या करता है

वो क्या है के
मम्दू का कद बहुत ऊँचा है
मम्दू के सिर में जो अपेक्षित है उसके लिए काफी जगह है
क्या करे पर वो जगह अब खुदसे से तो भरती नहीं
पर जो मम्दू का कद बहुत ऊँचा है
मम्दू दूसरों से उपकार की अपेक्षा करता है
फिर भी जो ना कोई उसकी अपेक्षाओं का पोषक उसे मिलता है
मम्दू ऐसे में क्या करता है
मम्दू फुसफुसाता है

उसी में-
मम्दू की माँ एक दिन मम्दू को चावल लाने को कहती है
मम्दू का कद जो ऊँचा है
वो चावल, दूकानदार, रास्ता, समय, अपनी माँ, खाना सब पर प्रश्न उपस्थित करता है
कुपित मम्दू फिर भी थैली हाथ में जमाए घर से निकलने ही लगता है
उसे आते हुए देखकर भी दरवाजे की कुंडी जो अपने आप खुली नहीं
मम्दू ऐसे में क्या करता है
मम्दू फुसफुसाता है

खिंच पटक कर मम्दू कुंडी खोल ही लेता है
मम्दू बाहर निकलता है
वैसे मम्दू का कद तो बहुत ऊँचा था
पर तभी तक जब तक उसने उन बच्चों को ख़ुशी ख़ुशी खेल-कूदते देख ना लिया था
मम्दू अब उन बच्चों को नई उचाईयों से देखने की कोशिश करता है
पर बच्चों पर होती जलन को भी मिटाने में जो वो असफ़ल
मम्दू ऐसे में क्या करता है
मम्दू फुसफुसाता है

मम्दू कुछ अनसुनी अनकही को लांघ कर, कुछ कर दूकान पहुँच ही जाता है
'अम्मा ने दो किलो चावल मंगवाए हैं', कहता है
दूकानदार चावल बांधकर, मम्दू को खाते में कितना जमा हुआ बतलाता है
पर मम्दू का कद तो ऊँचा है
मम्दू अपनी घडी में देखकर दरअसल दूकानदार को अपनी घडी दिखाना चाहता है
इसी बात पर दूकानदार मम्दू को खाते की बही दिखला देता है
मगर दुकानदार को क्या मालूम, के मम्दू का कद तो ऊँचा है
फिर मम्दू क्या करता है
मम्दू फुसफुसाता है

अब आगे जाने को कहीं था नहीं, वरना मम्दू क्या वापस उलटे आने वालों में से था?
मम्दू इसी तरह घर चावल ले आता है
अब मम्दू और उसकी माँ दोनों कहते हैं, 'चावल को कच्चा ही खाया जाए'
पर दोनों अपनी बात बड़ी जोरों से करते हैं, इसीलिए बेचारे एक दुसरे को सुन नहीं सकते हैं
इसी बात पर बिगड़कर, लाया चावल बाहर फेक देते हैं
मम्दू फेके हुए चावल को देखकर
चावल लाने की मेहनत बेकार हुई इस पर नाराज हो फुसफुसाए
या
हम ख़रीदा चावल फ़ेक भी सकते हैं ये लोग नहीं जानते ये पकड़ कर फुसफुसाए
मम्दू पहली बार सोचने लगता है
लेकिन जो मम्दू को सोचना पड़ता है
इसी बहाने,
मम्दू एक और बार फुसफुसा लेता है-

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