[व्यंग्य] वोह बात तो बेटा कभी थी ही नहीं - [satire] Woh Baat To Kabhi Thi Hi Nahin

हम कहते हैं, वोह बात तो कभी थी ही नहीं
जिसका है न हमारे पास कोई हल
अरे हाँ-

जिस दिशा भी वोह मुड़ जाती,
उसपे अपने बुने खाद डालदो,
अरे उसमे कौन बात है,
काफी हुआ कहके अपने ऐतराजही पाल लो

अरे संभल संभल
तेरे कदम फूंक फूंक
दीखता नहीं क्या तुझे
जो मगन ये हाथ अपने आकाश बुन बुन

अब करें ही क्या
जो समा न सकी वोह बात इस सारे जोड़ने जुडाने में

ले देख खाई ही चुके किसी तरह इस दशा को
निपटा ही चुके साली इस व्यथा को
अबे डकार सुनी की हुंकार सुनी!
देख चाचे मौसे
तम्बाकू लेके बैठे हैं
अब दुनियादारी की बातें करते हैं
हाँ जरूर भाई,
तम्बाकू के पत्ते किसी तरह तोह मलने ही हैं

अब और करें ही क्या,
अपने अभिमान के लिए कोई और बलि चढ़ाए ही क्या

मेरा माथा देखने जाओ तो शंकर की भभूत दिखेगी
अब समन्दर के आसार पूछोगे तो बेटा मार मिलेगी

कह तो रहे हैं,
वोह बात तो कभी थी ही नहीं
अबे हाँ!

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