उठो, उठो, मेरी मालकिन,

उठो, उठो, मेरी मालकिन, क्या तुम निद्रा समो रही।
तस्कर गृह चारों ओर खड़े, स्वप्न जग तुम सँजो रही।।
होठों मे लाली जो लगाई, कर दिया उसने मदहोश ।
मालिक भी घर लौट न पाये, तुम बनी निद्रा बेहोश ।।
खाना भी न खाया है तुमने, कर रही मालिक ईंतजार।
भूख भी क्या नहीं लगती, यह मेरा जीवन धिक्कार।।
कितनी देर से भोंक रहा हूँ, देखा न तनिक, मेरी ओर।
सँग समाज लिए सब आए, गृह घुस रहे चोर बरजोर।।
क्या किसी ने कुछ खिला दिया, आवाज सुनते तक नहीं।
अकेला क्या कर पाऊँगा, काटने सिवा, कुछ सकते नही।।ं
कितनी देर, मैंने जोर भोंके, तेरे पद तलवे बारबार चाटे।
लेकिन सुनी न मेरी, तनिक भी, भले मार देतीं मुझे तुम चाँटे।।
कहीं किसी ने मुझे गोली मार दी, मैं क्या कुछ कर पाऊँगा।
अब तो, उठ जाओ, हे मालकिन, न तो'नवीन'रोने लग जाऊँगा।।

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

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