अब तुमसे दूर जाना होगा 

हाँ; मुझे अब तुमसे दूर जाना होगा ,
जो अरमान मैंने सिर्फ तुम्हारे लिए सजाए थे कभी 
उन अरमानो को अब कही दफ़नाना होगा ।

न थी खता मेरी;  न तुम्हारी 
तुम भी दिल दे बैठे हमें और में भी ये दिल हारी 
भूल हुई जो हमसे ये एक दूजे को दिल देके
अब उस भूल की सजा को निभाना होगा ।
हाँ मुझे अब तुमसे दूर जाना होगा ।।

तुम रक़ीब थे मेरे;  हबीब नहीं 
तुम हमकदम थे सिर्फ मेरे ; नसीब नही
कि अब यही बोल के ; उम्र भर दिल को बहलाना होगा। 
हाँ मुझे अब तुमसे दूर जाना होगा ।।

यूँ तो कोई वजह,  कोई उम्मीद नहीं 
तुमसे फिर मिलने की  कभी 
फिर भी जो किसी राह पे टकराये जो कदम 
तो फिर देख के गैरों सा मुस्कुराना होगा 
या फिर अनजान बनके यूँ ही गुज़र जाना होगा ।
हाँ मुझे अब तुमसे दूर जाना होगा ।।

by DEEPTI MISHRA

Comments (1)

Oh how love can rattle the brain and middle the heart! Great poem!