अब अँकवार भर लो।

हे मेरे प्रिय! अब अँकवार भर लो।
रोम-रोम तरस रहे मेरे,
बाहों में भर प्यार कर लो।
यकीन न हो तो देखो मेरे बदन,
प्रति रोम अपने रुप दीदार कर लो।
एक रोम जो अपने नाम न पाओ,
नयन न तब चार कर लो।
जीत जाओ तुम मेरे देव तब,
जब 'नवीन'इकरार कर लो।

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

Comments (2)

A strong spirit indeed. As one with you, Tai
Thank you for sharing your spirit poem Mike - its really lovely. Blessings to you,