इच्छा मेरी अनन्त,

इच्छा मेरी अनन्त,
कर रही करुण पुकार;
हे देव! बने हम निसहाय,
बहते अविरल अश्रुधार।

तुमने कर दी अनन्त दया,
अब सता रही नहीं कोई माया,
अपूर्ण जो थे, बने आज पूण^,
अनवरत कृपा रसधार।

दिन-ब-दिन मिलते गये वैभव,
परम शून्य बन गये सहृदय,
अनन्त दिये उपहार,
मिली गगन-ज्योति, महिमा अपरँपार।

पूण^ हो गई सुख-सँपदा,
मिट गई सब जग-विपदा,
तन-मन को मिला आराम,
हम भूल गये सुखधाम।

कई बार मिले सुसमय,
किन्तु पा न सके हम रसमय,
हमने तन-मन से दी ढील,
तेरे द्वार न तके एक बार।

तुमने भी छिपाया अपने आपको,
भ्रम हो गया मेरे मन को,
हम भी न रुके तेरे द्वार,
कह न सके व्यथा पुकार।

प्रकृति ने कर दिया विस्तार,
दिखाया अप्रतिम सँसार,
फँस गये जगत व्यवहार,
हम पड़ गये सँसार -सँस्कार।

आशाओं का रुप अनन्त,
इच्छा का न हो सकता अन्त,
अब हाथ में तेरे सब, मेरे प्यार!
अब हाथ पकड़ कर, लो उबार।

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

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