सोच लिया अब, अब हम भरेंगे तुम्हें अँकवार,

सोच लिया अब, अब हम भरेंगे तुम्हें अँकवार,
मिलेंगे तुमसे, तुमसे मिलेंगे, इसी जन्म एकबार,
सागर कितना भी गहरा, जहाज उसीमें चलता,
मल्लाह पतवार डालकर, उसी को पार करता है
तज रे मन आलस्य, समय सब गये हैं बीत अब
मुझे प्यारे से मिलना, बुला रहा मेरा प्यारा मीत
बीता शरद, बीता वसँत, पतझड़ के दिन आए,
सब तरुवर के पुहुप डाल पाँती समेत मुरझाए,
पत्रहीन शाख सव^त्र, पता न कब यौवन आये,
आकर प्राण-तरंग मेरा, कब मेरे हृदय समाये,
सुरभित समीर न बह रहे, गति बन गई अवरुद्ध
मन-प्राण मेरे तरस रहे, हो गये मेरे कंठ भी रुद्ध
देखते गगन ओर नयन, समीर तरंगें चल रहीं
प्राण वायु रुप ले आकार, निवि^घ्न मिल रहीं
सी-सी करती रहतीं, सीता-सीता नाम सुनाती
वही सीता, वही सीता, जो राम बिना न रह पाती
तू भी प्राण वायु सँग मिल, अब मत कर तू देर,
नहीं तो मिलन रात बीतेगी, 'नवीन'होगा कुबेर।

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

Comments (5)

...an amazing write, and so dark...actually gives the reader something to contemplate ★
wow lovely poem indeed. nice rhyme
Stunning work as every Poe work be...~FjR~
Awesome Poe as usual!
im sorry if you get this message more than once, i rememered this poem differently? Did you modernize it for this post, or have i gone crazy?