परम प्रेम रस जाने सोई,

परम प्रेम रस जाने सोई,
प्रीति पँक पग पगे जिनकर।
जो न कोई परम -प्रीति जीवन,
बीते पल सम असवार खर।
प्यार पाई जीवन बनत ऐसो,
जैसे प्यारे सदा लिपटत गर ।
जब दर्शन दुल^भ प्रियवर कर,
अँखिया बनै सदा निझ^र झर।
जब प्रेमी प्रेम सफल होई जावैं,
. मिलत जात सब सँताप पाप हर।
काल कराल सहजहि सौम्य बनें,
लखि लखि रुप काँपत थरथर ।
चित गति भले बेहाल होई जावैं,
रुप रस पान करै जिमि मधुकर।
'नवीन'अलमस्त घूमै जगत महँ,
लखत न सपने, काहू को कहीं डर।

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

Comments (3)

Like some enchanted far-off isle In some tumultuous sea- Some ocean throbbing far and free With storms- but where meanwhile Serenest skies continually Just o'er that one bright island smile. Warm regards for the sharing of this beautiful poem.
............beautifully penned, everyone needs a special friend like this ★
You light up my life.....