प्रातः अरुणिम बेला में,

प्रातः अरुणिम बेला में,
भिक्षुक खड़ा था मेरे द्वार।
दीन- हीन जर्जर बदन मन,
दुब^लता का न था पारावार।।

दाढ़ी मूँछ केश सब श्वेत,
दीख रहा था शुभ्र बदन ।
अँदर कौन झाँक सकता, भाई!
कैसा किसी का भी अन्तर्मन ।।

गिड़गिड़ा कर कहने लगा तब,
दे दो मुझे कहीं भी स्थान ।
तुम्हें भी कोई कष्ट न होगा,
बना तेरा आलीशान मकान।।

बुढापे में मुझे सहारा मिलेगा,
भगवान भी देगा आशीष वरदान।
तन मन बदन वचन आर्त्त देख,
मैंने दे दिया अपना निवास स्थान।।

धीमे धीमे उसने पाँव पसार लिये,
धीरे धीरे साज दिये अपने सामान ।
रहने को तो असबाब सबको चाहिए,
बढ़ा लिये अपने सब अरमान सम्मान।।

अब तो अकड़कर चलने लगा वह,
घूमने लगा वह, भाई! सीना तान ।
नजर मेरी ओर वह कभी न करता,
बढ़ गई थी अब उसकी अपनी शान।।

कहा था उसने, भजन कीर्तन करुँगा,
कभी न रहा उसका इससे भी मतलब।
मैंने आरँभ में था टोका था जरुर,
बाद में छोड़ दिया यह, ले लिया सबब ।।

अब तो बदल गई पूरी ही नीयत,
देखता राह, कब आ जाये यहाँ अँधकार।
उठाकर सबकुछ ही ले जायें, चोरी,
बिगाड़ दें पूरे परिवार का बसा सँसार।।

अब रातभर न नींद भूख प्यास मुझको,
कैसे शरणार्थी को भगाऊँ, हे मेरे भाई!
हे भगवान! अब तुम अपनी माया हर लो,
"नवीन"लुटने वाली, अब सारी कमाई।।

by Dr. Navin Kumar Upadhyay

Comments (3)

That is so true and i know how it feels to be someone's friend when they don't care for you. It is very hard and yet i'm still trying. Lovely poem and i loved it.
Nice poem about friendship, enjoyed reading it. Rosemary
I agree friends are suspose to be forever......But my best friend married someone younger then us and we drifted apart......