पतझड़ का आह्वाहन... Patjhad

पतझड़ का आह्वाहन
सोमवार, १ अक्टूबर २०१८

रहने दो ना
किसी को नहीं है मना
पर मुझे छोड़ दो अकेली
नहीं चाहिए मुझे कोई सहेली।

मेरी वीरानी मुझे मंजुर है
दिल में यादें मौजूद है
उसका भी तो कोई वजूद है
बस मेरी गुमनामी कीव वजह खुद है।

ये पतझड़ ही मेरा सहारा है
सब कोई तो अपना ही है
मुझे वारबार क्यों ऐसा लग रहा है?
किसका गम मुझे सत्ता रहा है?

मेरी चीख ही मुझे सुनाई देती
मेरी आत्मा कहती है रोती रोती
तूने क्यों उझालो से महोब्बत की?
क्यों दस्तक दी या नौबत की?

बस मेरी आवाज दबी ही रहने दो
मेरी धड़कन को मुझे सुन ने दो
वो चीखचीख कर कह रही है
सावन में भी पतझड़ का आह्वाहन कर रही है।

हसमुख अमथालाल मेहता

by Hasmukh Amathalal

Comments (2)

This is great, I really like it. It's sort of like a prose. Good job :)
I love this poem...I think what I am trying to do is just write, no rewriting, no revision, straight, and I'm trying to keep it simple, the obvious joys, joys at arms length not Romantic stuff: exotic dark gothic vampires, not the conservative Romantic stuff, but more like Shelley and Whitman. Thank you.